"क्या 2025 वाकई मनहूस साल है या हम ही हादसों को न्यौता दे रहे हैं?"
हर रोज एक नई खबर, हर रोज एक नया डर… और अब तो मां-बाप दुआ मांगते हैं कि बेटा ट्रेन से सही-सलामत उतर जाए, फ्लाइट लैंड कर जाए, स्टेशन पर अफरातफरी न मच जाए।"क्या 2025 वाकई मनहूस साल है या हम ही हादसों को न्यौता दे रहे हैं?"
हर रोज एक नई खबर, हर रोज एक नया डर… और अब तो मां-बाप दुआ मांगते हैं कि बेटा ट्रेन से सही-सलामत उतर जाए, फ्लाइट लैंड कर जाए, स्टेशन पर अफरातफरी न मच जाए।
29 जनवरी 2025 — प्रयागराज का महाकुंभ… जहां भीड़ नहीं आस्था उमड़ रही थी, वहां मौनी अमावस्या के दिन सब कुछ कुचल गया। लाखों लोग आए थे पवित्र डुबकी लगाने, लेकिन लौटे कितने… यह भीड़ बता नहीं पाई।
बेंगलुरु में जश्न चल रहा था, लेकिन एक सेकेंड ने सब बदल दिया। जो हंसी थी, वो मातम में बदल गई।
मुंबई की लोकल ट्रेन… जो हर दिन लाखों लोगों को गंतव्य तक पहुंचाती है, वही एक दिन काल बन गई।
केदारनाथ… जहाँ जाने वाले मोक्ष की कामना करते हैं, वहां यात्रा अधूरी रह गई।
दिल्ली के रेलवे स्टेशन पर भीड़ नहीं, डर दौड़ रहा था… जिंदगी किसे मिलेगी, ये फैसला अफरातफरी ने किया।
और पुणे में… एक पुल लोगों को ले डूबा।
अहमदाबाद में तो आसमान से मौत ही बरस गई।
और पहलगाम, जो धरती का स्वर्ग कहा जाता है… वहां आतंक ने उसे खून से रंग दिया।
ये सब सिर्फ 6 महीने में हुआ… जनवरी से जून तक। क्या ये सिर्फ संयोग था? क्या ऊपर वाला हमसे नाराज़ है? या फिर… हम ही इतने लापरवाह हो चुके हैं कि हर हादसा अब सिस्टम की भूल बन गया है।
हर खबर डराती है, हर सफर भरोसे का नहीं रह गया।
अब तो बस देशवासियों के मुंह से एक ही बात निकलती है –
“बस कर भाई… बस कर ऊपर वाले, अब और नहीं देखा जाता।”
सवाल अब यही है –
क्या 2025 मनहूस साल था?
या फिर हमने लापरवाही की सारी हदें पार कर दीं और आज हम उसी की कीमत चुका रहे हैं?
आप क्या सोचते हैं? ये सब किस्मत थी या हमारी नालायकी?
"प्लेन में बैठने में डर लगने लगा है, ट्रेन में चढ़ने में डर लगने लगा है… हर चीज़ में अब डर लगने लगा है... इतना डर कि अब तो यूं ही डर के मारे मरने का डर लगने लगा है।"
2025 का ये साल... किस्मत की मार है या लापरवाही की सजा? अब ये समझ नहीं आता…
9 जून - मुंबई लोकल हादसा:
वो ट्रेन, जो हर दिन शहर की धड़कन बनती है, इस दिन मौत की सवारी बन गई। सिर्फ बैग टकराए थे... लेकिन चार लोग जिंदगी से टकरा गए… ट्रेन से गिरे और लौटकर कभी नहीं आए।
केदारनाथ हेलीकॉप्टर हादसा:
भगवान के दर्शन के लिए निकले थे... लेकिन मोक्ष की राह में मौत मिल गई। मशीन फेल हुई या चेकिंग फेल थी… ये किसी को नहीं पता… सात श्रद्धालु सिर्फ एक संख्या नहीं थे – वो किसी के बेटे थे, किसी की मां, किसी की आखिरी ख्वाहिश…
4 जून - आईपीएल स्टेडियम में भगदड़:
आरसीबी जीत गई थी… लेकिन कुछ लोग जिंदगी की जंग हार गए। जश्न मातम में बदल गया। गूंजती तालियों की जगह चीखें गूंज रही थीं। 11 लोग… 11 कहानियां… जो अब अधूरी रह गईं।
15 फरवरी - दिल्ली रेलवे स्टेशन हादसा:
लोग महाकुंभ के लिए निकले थे… पुण्य कमाने। लेकिन लौटे… चप्पलों की ढेर और लाशों की कतार के साथ। अगर बस एक अनाउंसमेंट वक्त पर होता… शायद कोई न मरता।
12 जून - अहमदाबाद प्लेन क्रैश:
लंदन जाने का सपना लेकर निकले थे… लेकिन सिर्फ एक यात्री जिंदा लौटा। 242 ज़िंदगियां खत्म… किसी का बेटा, किसी की बेटी, किसी का आखिरी गिफ्ट… सब राख बन गए।
22 अप्रैल - पहलगाम आतंकी हमला:
जहां लोग सुकून ढूंढने जाते हैं… वहां खून बहाया गया। 26 जाने गईं। कोई हनीमून पर था, कोई रिटायरमेंट के बाद पहली बार घूमने निकला था… लेकिन सबका सफर वहीं खत्म हो गया।
कुंभ हादसा:
1954 से लेकर 2025 तक… हर बार मौत ही स्थायी रहती है। तैयारियां सिर्फ कागजों में होती हैं, और लोग असल में मर जाते हैं। क्या ये खराब किस्मत है या सिस्टम की पोल?
पुणे ब्रिज क्रैश:
Instagram पर वायरल स्पॉट… अब लाशों का फोटो स्पॉट बन गया। बारिश से टूटा पुल – जिसकी कई बार चेतावनी दी गई थी। लेकिन इंतजार मौत का ही किया गया लगता है…
स्टोरी खत्म नहीं हुई...
सवाल वहीं हैं – क्या ये हादसे थे? या सिस्टम की लाचारी? क्या ऊपर वाला नाराज़ है? या हम खुद मौत को न्योता दे रहे हैं?
हर हादसा एक ही बात कहता है…
“मौतें लापरवाही से भी आती हैं, और किस्मत से भी… लेकिन फर्क बस इतना है कि किस्मत को नहीं सुधारा जा सकता, लेकिन सिस्टम को सुधारा जा सकता है।”
लेकिन क्या हम सुधरेंगे? या बस हर बार अफसोस करते रहेंगे...
"मुआवजा मिल गया... जांच शुरू है... हमें दुख है..."
बस इतना ही कहकर हम अगली त्रासदी के लिए तैयार रहते हैं।



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